कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।जब नए सफर पर चले थे हम,
अनजान गलियाँ, गुमनाम शहर,
तब थामा था तुमने हाथ मेरा,
हो कर बेखौफ, हो कर निडर।
बस उसी सफर को एक बार याद कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।
अनजान थे तुम भी राहों से,
आने वाले सैलाबों से,
पर फिर भी थामे रखा तुमने,
मेरे हाथ को अपने हाथों से।
बस उसी डगर को एक बार याद कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।
रोए जब, तुमने कँधा दिया,
डर लगा तो बाँहों में भर लिया,
एक आह पर मेरी रोए थे,
मेरे गमों को भी अपना कर लिया।
बस उन्हीं आँसुओं को एक बार याद कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।
वक्त यूँ ही निकलता गया,
कारवाँ जो था वो चलता गया,
होंगे कभी ना तुमसे दूर,
यकीन था हमको, और बढ़ता गया।
बस उसी वक्त को एक बार याद कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।
पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था,
मिलना-बिछड़ना तो सदियों से जीवन का दस्तूर था,
वैसे तो हम यूँ भी जी लेते ऐ मेरे दोस्त,
पर तुमसे दूर रहकर जीना कभी मौत से क्या कम था!
फिर भी हमारे उस साथ को एक बार याद कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।
सोचा तो ना था कभी ये दिन भी आएगा,
वो यार मेरा खुद में ही मशरूफ रह जाएगा,
इस जिन्दगी की दौड़ में, रास्ते अलग सही,
पर तू इतनी दूर निकल जाएगा।
बस इसी दूरी को एक बार मिटा कर,
कल मिलो जो किसी मोड़ पर तो अनजान ना बनना,
साथ चले थे हम कभी, साथ चले थे यूँ ही।